Saturday, July 24, 2010

Thursday, July 22, 2010

Sunday, July 18, 2010

Wednesday, July 14, 2010

पानी आया पास!



- डेढ़ की बजाए आध्ाा किमी पर मिलेगा पानी
- सौ की बजाए तीस मीटर ऊंचाई पर बनेंगे जलस्त्रोत
- पैमाने बदलने से 61 हजार बसाहटों को लाभ।

जितेन्द्र चौरसिया

भोपाल। प्रदेश में पानी आम आदमी के और पास आ गया है। दरअसल, सरकार ने करीब चार दशक पुराने पानी उपलब्ध्ा कराने के पैमाने बदल दिए हैं। पहले गांवों में डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर जल स्त्रोत मुहैया कराने का नियम था, लेकिन अब इस दूरी को घटाकर आध्ाा किलोमीटर कर दिया गया है। इससे आने वाले सालों में डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर पानी लेने जाने वाले लाखों लोगों को आध्ाा किलोमीटर के अंदर ही पानी मिल सकेगा। इससे 61 हजार से अध्ािक ग्रामीण बसाहटों को फायदा मिलेगा।

केंद्र सरकार की गाइडलाइन पर करीब तीन दशक पहले मध्यप्रदेश ने ग्रामीणों को पानी मुहैया कराने के मापदंड तय किए थे। इसमें डेढ़ किलोमीटर (1।6 किमी) की दूरी पर जल स्त्रोत होने पर यह माना जाता था कि संबंध्ाित गांव की आबादी को पानी मुहैया है। सारी जल योजनाएं इसी आध्ाार पर बनती थी और इतनी दूरी से कम पर गांव के लिए कोई जल स्त्रोत नहीं बनाया जाता था। इस साल से मध्यप्रदेश ने केंद्र की गाइडलाइन पर नियमों में बदलाव कर दिया है।

नए नियमों में आध्ाा किलोमीटर की दूरी पर जल स्त्रोत उपलब्ध्ा कराना अनिवार्य किया गया है। इससे नए बनने वाले जल स्त्रोत आध्ाा किलोमीटर के पैमाने को ध्यान में रखकर बनाए जाएंगे। कम ऊंचाई पर मिलेगा पानी- सरकार ने ऊंचाई वाले क्षेत्रों के लिए भी नियमों में बदलाव कर दिया है। पहले सौ मीटर की ऊंचाई पर जल स्त्रोत होने पर पानी की उपलब्ध्ाता मानी जाती थी, लेकिन इसे अब सत्तर मीटर घटा दिया गया है। इसके तहत पहाड़ी व ऊंचाई वाले इलाकों में ग्रामीणों को सौ मीटर तक की ऊंचाई तक पानी लेने नहीं जाना पड़ेगा और उन्हें तीस मीटर पर ही पानी मिल सकेगा। कम आबादी पर भी पानी- आबादी के मानदंड भी पानी के मामले में बदल दिए गए हैं। इस साल से एक हजार की ग्रामीण आबादी पर भी जल स्त्रोत बनाए जाएंगे, जबकि इससे पहले दो हजार की आबादी पर ही जल स्त्रोतों का निर्माण किया जाता था। इन तीनों प्रकार के बदले मानदंडों से करीब बारह हजार से अध्ािक ग्रामीण बसाहटें लाभांवित होंगी।

मुख्यमंत्री पेयजल योजना पर असर-

इन बदले नियमों का असर नई मुख्यमंत्री ग्रामीण पेयजल योजनाओं पर भी पड़ा है। इसी कारण इस योजना में पांच सौ से हजार की आबादी वाली बसाहटों पर पेयजल उपलब्ध्ा कराया जाएगा। इसके दायरे में करीब चार हजार गांव आने का अनुमान है।

फैक्ट फाइल

1,27,036 ग्रामीण बसाहटें प्रदेश में

4,46,000 हैंडपंप संचालित प्रदेश में

12 हजार से अध्ािक बड़े गांव प्रदेश में

8,550 नलजल योजना केवल बड़े गांवों में

61 हजार बसाहटे नए पैमाने से फायदा लेंगी

2010 से छोटे गांवों पर भी ध्यान

कहना है-

जनता को सहजता से पानी उपलब्ध्ा हो, इस कारण पानी के पैमानों में बदलाव किया है। भारत सरकार की गाइडलाइन के तहत जल स्त्रोत उपलब्ध्ाता की दूरी डेढ़ किमी से घटाकर आध्ाा किमी कर दी गई है। इससे ग्रामीणों को कम दूरी पर पानी मिलेगा।

- गौरीशंकर बिसेन, मंत्री, लोक स्वास्थ्य एवं यांत्रिकी विभाग, मध्यप्रदेश

डूबत खाते में बैंकों के 54,000 करोड़!

- कर्ज दिया, मर्ज लिया
- मप्र के 2000 करोड़ भी में
- आर्थिक मंदी बैंकों को पड़ी भारी
जितेन्द्र चौरासियाभोपाल।
आर्थिक मंदी की आंध्ाी ने वर्ष-2009 में देश में बैंकों के करीब 54 हजार करोड़ रुपए डूबने की कगार पर पहुंचा दिए हैं। बैंकों ने इसे लगभग डूबत खाता यानी अनुत्पादक सम्पदा (एनपीए) घोषित कर दिया है। इसमें मध्यप्रदेश के भी करीब दो हजार करोड़ शामिल हैं।
सभी सरकारी व निजी बैंक हर साल कर्ज में दी गई राशि की वसूली का आंकलन करते हैं। इसमें देशभर में वर्ष-2009 मंे करीब 54 हजार 108 करोड़ की राशि ऐसी पाई गई है, जो लगभग डूबत खाते में हैं। यंू तो हर साल बैंकों की राशि डूबती है, लेकिन 2009 में आर्थिक मंदी के कारण इसकी रफ्तार बढ़ गई। आम आदमी को भले ही आर्थिक मंदी ने अध्ािक नुकसान न पहुंचाया हो, लेकिन बैंकों को तगड़ा झटका दिया है। राष्ट्रीय स्तर पर पेश वित्त मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष-2008 की तुलना में वर्ष-2009 में एनपीए राशि में काफी बढ़ोत्तरी हुई है। वर्ष-2008 में जहां देशभर के बैंकों में एनपीए 40 हजार 984 करोड़ रुपए था, वहीं 2009 में एनपीए करीब 54 हजार 108 करोड़ दर्ज किया गया। खास बात यह कि इसमें स्टेट बैंक ऑफ इंडिया सबसे ऊपर है। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया का देशभर में 17 हजार करोड़ से अध्ािक रुपया एनपीए में चला गया है। हालांकि भोपाल सर्कल ने उलटे एनपीए कम करके रिकार्ड कायम किया है। फिर भी बाकी जगह एनपीए बढ़ने से बैंकों में घबराहट है। मध्यप्रदेश में दो हजार करोड़ से अध्ािक की राशि एनपीए में है। इसमें 565 करोड़ तो अकेले स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के हैं। इसके बाद बैंक ऑफ इंडिया और स्टेट बैंक ऑफ इंदौर सहित निजी बैंकों के करोड़ों रुपए एनपीए मंे पहुंच गए हैं। लगभग हर बैंक को 2010 में एनपीए कम करने के निेर्देश दिए गए हैं।
एसबीआई भोपाल देश में अव्वल-
देशभर में भले ही एनपीए बढ़ रहा हो, लेकिन एसबीआई भोपाल(मप्र) सर्कल एनपीए कम करने मंे पूरे देश में अव्वल रहा है। इसके बाद एसबीआई मुंबई, बैंगलोर, पटना और लखनऊ का नंबर आता है। भोपाल(मप्र) सर्कल का एनपीए 2008 में साढ़े छह सौ करोड़ था, लेकिन 2009 में यह घटकर 565 करोड़ रह गया है। एसबीआई मप्र के एनपीए मैनेजमेंट एजीएम आरएम विरमानी बताते हैं कि करीब 88 करोड़ एनपीए कम करने बड़ी सफलता है, क्योंकि यह राशि लगभग डूबत वाली होती है। इस बार सितंबर-2009 से ही लक्ष्य रखकर मुहिम चलाई, जिससे यह सफलता मिली। अगले साल हम इसे और कम करने का लक्ष्य रख रहे हैं।
सरकारी योजनाएं डूबाएंगी-
बैंकों का करोड़ों रुपया सरकारी योजनाओं के तहत कर्ज पर दिया गया है। सरकारी सेक्टर होने के कारण यह राशि लगभग डूबत खाते में चली जाती है, क्योंकि इसमें जप्ती की कार्रवाई के लिए बैंकों को बहुत लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। मध्यप्रदेश में एसबीआई का ही 2009 में पौने दो सौ करोड़ सरकारी योजनाओं के तहत कृषि क्षेत्र में एनपीए में पहुंचे हंै। वहीं डेढ़ सौ करोड़ स्र्पए आम आदमी ने लौटाने से इंकार कर दिया। इसी तरह लघु उद्योग क्षेत्र में करीब डेढ़ सौ करोड़ रुपए डूबने की कगार पर है।
निजी बैंक कर लेते हैं वसूली-
सरकारी बैंकों की तुलना में एनपीए को कम करने में निजी बैंक आगे हैं। अध्ािकतर निजी बैंक जप्ती व नीलामी के जरिए एनपीए को कम कर देते हैं, क्योंकि सरकारी बैंकों की तुलना में इन्हें आंतरिक तौर पर कम कानूनी प्रक्रियाएं पूरी करनी होती है।
पैसा डूबने की वजह-
इस साल पैसा डूबने की एक बड़ी वजह आर्थिक मंदी रही है। मंदी के कारण कई कंपनियां कंगाल हो गई, जिससे वह बैंका का पैसा भी नहीं लौटा सकी। इसके अलावा सरकारी सेक्टर की योजनाओं मंे देरी या योजना बंद होने से राशि एनपीए में गई। वहीं एनपीए बढ़ने के पीछे त्रुटिपूर्ण आवंटन, संबंध्ाित एजेंसी का ही बंद होना, नौकरी जाना आदि कारण रहे। क्या है एनपीए-जिस भी कर्ज के प्रकरण में तीन से छह महीने तक किश्त नहीं आती, उसे एनपीए खाते में डाल दिया जाता है। इस राशि को डूबने की कगार पर माना जाता है और अध्ािकतर मामलों में सम्पत्ति जप्ती और नीलामी के बाद ही वसूली हो पाती है। इन मामलों में राशि वसूली के लिए उलटे बैंक को काफी खर्च करना पड़ता है। सामान्यत: हर साल हर बैंक का एनपीए बढ़ता ही जा रहा है।
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बैंकों की राष्ट्रीय अनुत्पादक सम्पदा का लेखा-जोखा-(करोड़ मंे)
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बैंक- 2008 में 2009 में
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स्टेट बैंक ऑफ इंडिया 12596 १७०६१
बैंक ऑफ इंडिया 2004 ३८०१
पंजाब नेशनल बैंक २९२० ३१६५
इंडियन ओवरसीज बैंक 1486 ३०४४
केनरा बैंक 2487 २५४४
सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया 2288 २४५४
इडबी बैंक लिमिटेड 1454 २३१७
यूनियन बैंंक 1557 २०९८
बैंक ऑफ बड़ौदा 1759 २०४५
सिंडीकैट 1760 २०१५
यूको बैंक 1475 १४९३
ओरिएंटल बैंक 1088 १२८८
बैंक ऑफ महाराष्ट्र 744 १२१७
इलाहाबाद बैंक 1015 ११६०
यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया 976 १०६७
स्टेट बैंक ऑफ पटियाला 510 १००३
विजया बैंक 648 ९०५
कारपोरेशन बैंक 560 ७५२
स्टेट बैंक ऑफ ट्रावनकोर 624 ७०७
स्टेट बैंक ऑफ बीएंडजे 437 ६४५
देना बैंक 585 ५७६
स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद 407 ५४९
स्टेट बैंक ऑफ मैसूर 394 ५३५
इंडियन बैंक 440 ४७७
स्टेट बैंक ऑफ इंदौर 245 ४७७
आंध्ा्र बैंक 373 ४७७
पंजाब एंड सिंध्ा बैंक 152 २३६
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राशि जनवरी से दिसंबर 2009 की स्थिति में।
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