Friday, May 28, 2010

183 शहरों को अब...दूसरे शहर से नहीं बुलाना होगी फायर ब्रिगेड!

- 45 करोड़ की कार्ययोजना तैयार
- पुलिस फायर सर्विसेस भी नगरीय प्रशासन के अध्ाीन आएंगी
- मप्र अग्निशमन सेवा विध्ोयक बदलेगा स्वरूप
जितेन्द्र चौरसिया
भोपाल। प्रदेश के करीब 183 शहरों में अब आग लगने पर मदद के लिए पड़ोसी शहर का मुंह नहीं ताकना होगा। सरकार ने करीब 45 करोड़ से हर नगरीय निकाय में फायर ब्रिगेड की सुविध्ाा मुहैया कराने का प्लान तैयार कर लिया है। साथ ही मध्यप्रदेश अग्निशमन सेवा विध्ोयक बनाया जा रहा है। इसके चलते पुलिस महकमे की फायर सर्विसेस की कमान भी अगले एक महीने में नगरीय निकायों के पास आ सकती है। इसके बाद मैदानी अमल शुरु होगा।
मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के संकल्प में फायर सर्विसेस शामिल होने के बाद नगरीय प्रशासन विभाग ने हर नगरीय निकाय को फायर ब्रिगेड की सुविध्ा उपलब्ध्ा कराने का प्लान बना लिया है। फिलहाल करीब 183 नगरीय निकायों में फायर सर्विसेस नहीं है। इन निकायों में अभी यदि आग लग जाती है, तो पड़ोसी निकाय से फायर ब्रिगेड बुलानी पड़ती है। इसलिए इन निकायों में 45 करोउ रुपए से फायर सर्विसेस उपलब्ध्ा कराने का प्लान बनाया गया है। इसके तहत हर नगरीय निकाय पर कम से कम एक फायरमैन जरुर रखा जाएगा। इसके लिए नई भर्ती भी होगी। साथ ही जिन निकायों में पहले से फायर सर्विसेस हैं, वहां बरसों से खाली पड़े पदों की पूर्ति भी की जाएगी। इसके अलावा नई दमकलें, फायर सूट सहित अन्य फायर सर्विसेस उपकरण भी खरीदे जाएंगे।
एक विभाग के अध्ाीन होगी फायर सर्विसेस-
पुलिस महकमे के अध्ाीन संचालित फायर सर्विसेस भी अब नगरीय प्रशासन विभाग के अध्ाीन आना है। इस कारण बाकायदा कार्ययोजना बनाई जा रही है कि किस तरह पुलिस फायर सर्विसेस नगरीय प्रशासन विभाग में मर्ज होगी। इसमें स्टॉफ, कार्यालय से लेकर संसाध्ानों तक पर विचार-विमर्श हो रहा है। सूत्रों के मुताबिक अध्ािकारी स्तर के स्टॉफ को छोड़कर बाकी का स्टॉफ भी नगरीय प्रशासन विभाग में मर्ज हो सकता है। अगले एक महीने में इसकी प्रक्रिया पूरी होने की संभावना है। इसके बाद नगरीय प्रशासन विभाग फायर ब्रिगेड उपलब्ध्ा कराने और उसके आध्ाुनिकीकरण की प्रक्रिया शुरु कर देगा।
विध्ोयक बदलेगा व्यवस्था-
अग्निशमन सेवाओं को सुदृढ़ और आध्ाुनिक करने के लिए मप्र अग्निशमन सेवा विध्ोयक भी बनाया जा रहा है। इसके फायर सर्विसेस की नियंत्रण बॉडी एक ही रखी जाएगी। साथ ही आग से नुकसान, जांच, तत्काल सुविध्ाा मुहैया कराने सहित कई बिंदुओं पर नए नियम तैयार होंगे। अभी यह अध्ययन और विचार-मंथन की प्रक्रिया में हैं।
दूर होगी पैसे की दिक्कत-
अभी पुलिस और नगरीय निकाय दोनों की फायर सर्विसेस पैसे की दिक्कत से जूझ रही है। पुलिस अग्निशमन सेवा भोपाल, इंदौर, पीथमपुर और मालनपुर में है। बाकी शहर नगरीय प्रशासन की अग्निशमन सेवा के भरोसे हैं। दोनों ही प्रकार की अग्निशमन सेवाएं स्टॉफ, संसाध्ान और पैसे की कमी से जूझ रही हैं और इन सेवाओं को अपग्रेड करने के प्रस्ताव के ठंडे बस्ते में पड़े हैं। पुलिस महकमे की फायर सर्विसेस को तो आग बुझाने के लिए फोम और पानी तक पर्याप्त मात्रा में नहीं मिलता।
नुकसान पर अंकुश की कोशिश-
वर्ष 2009 में पुलिस फायर सर्विसेस को 600 कॉल आगजनी और 140 कॉल दुर्घटना से बचाव करने के आए। आगजनी से 7 करोड़ 35 लाख स्र्पए की क्षति हुई है और करीब तीन करोड़ की संपत्ति बचाई गई है। सबसे अधिक घटनाएं अप्रैल,मई ,जून और अक्टूबर माह में हुई हैं। इस दौरान 40 लोगों की मौत हुई है और 127 की जान बचाई गई।
बरसों से खाली पड़े पद-
प्रदेश में नगरीय प्रशासन के तहत अग्निशमन सेवा के बीस प्रतिशत पद खाली पड़े हैं। बरसों से खाली पड़े इन पदों की सुध्ा अब सरकार ने ली है। इसी तरह पुलिस फायर सर्विसेस में दो सौ से अधिक स्टाफ हैं, लेकिन एक दर्जन से अधिक पद काफी समय से रिक्त पड़े हैं। नई व्यवस्था के तहत इन स्थितियों में बदलाव आने की संभावना है।
संसाध्ानों में फिसड्डी-
प्रदेश की अग्निशमन सेवा संसाध्ानों के मामले में भी फिसड्डी है। नगरीय निकायों के पास बीस से पच्चीस साल पुरानी दमकलें भी चल रही हैं। वहीं कई शहरों में तो हालत यह है कि तीन से चार दमकल वाहन ही रहते हैं। ऐसे में यदि तीन-चार जगह एक समय में आग लग जाए, तो अफरा-तफरी मच जाती है। इसके अलावा फायर सूट, फायर ग्लास सहित अन्य सामानों के मामले में भी दमकलकर्मियों को थोड़े में ही गुजारा करना पड़ रहा है। राज्य सरकार ने अग्निशमन सेवा के आध्ाुनिकीकरण के लिए सौ करोड़ की योजना बनाई थी, लेकिन वह ठंडे बस्ते में चली गई।
फैक्ट फाइल-
338 नगरीय निकाय प्रदेश में
183 शहरों में फायर सर्विसेस नहीं
155 शहरों में अभी फायर सर्विसेस मौजूद
इनका कहना है-
करीब 45 करोड़ रुपए की नई योजना तैयार की गई है। अभी करीब 183 शहरों में फायर सर्विसेस नहीं है। पहले इन शहरों में प्राथमिकता से फायर सर्विसेस उपलब्ध्ा कराएंगे। इसके अलावा जहां अभी फायर सर्विसेस हैं, उनका आध्ाुनिकीकरण भी होगा।
- एसपीएस परिहार, सचिव, नगरीय प्रशासन विभाग, मप्र

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Friday, May 21, 2010

देश के 70 फीसदी गांवों ने नहीं देखा बैंक!

- देश में पांच प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्र तक ही पहुंच बनी।
- देश में साठ हजार गांवों में बैंकिंग सेवाएं पहुंची ही नहीं।
- योजना आयोग की अप्रैल-2010 की रिपोर्ट में खुलासा।

जितेन्द्र चौरसिया
भोपाल। आपको जानकर आश्चर्य होगा आजादी के छह दशक बीत जाने के बावजूद मध्यप्रदेश के सत्तर फीसदी ग्रामीण इलाके अभी भी बैंकिंग सेवाओं की पहुंच से दूर हैं। प्रदेश के शहरों में हर कदम पर बैंकिंग सेवाएं हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सेवाओं के उपयोग व पहुंच का अध्ािकतम दायरा केवल तीस प्रतिशत है। इसमें भी करीब बीस जिलों के ग्रामीण इलाके केवल दस से बीस फीसदी बैंकिंग सेवा की पहुंच में आ सके हैं। पूरे देश में ऐसे करीब साठ हजार गांव पाए गए हैं, जहां बैंकिंग सेवाएं पहुंची ही नहीं हैं।
यह खुलासा केंद्रीय विशेष पहचान-पत्र प्राध्ािकारण (योजना आयोग) की अप्रैल-2010 की रिपोर्ट में हुआ है। इसमें देशवासियों के विशेष पहचान-पत्र बनाने की प्रक्रिया के तहत भारतीय रिजर्व बैंक और राज्यों से ग्रामीण बैंकिंग के डाटा बुलाए थे। इसमें सितंबर-2009 की स्थिति में डाटा दिया गया, जिसकी रिपोर्ट अप्रैल-2010 में जारी की गई है। रिपोर्ट बताती है कि प्रदेश के शहरों में भले ही बैंक व एटीएम की भरमार हो, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में सत्तर फीसदी तक बैंकिंग सेवाएं नहीं पहुंच सकी है। रिपोर्ट के मुताबिक मध्यप्रदेश में अध्ािकतर जिलों के ग्रामीण क्षेत्रों में बीस से तीस प्रतिशत तक ही बैंकिंग सेवा पहुंच बना सकी है। वहीं दस से बीस प्रतिशत वाले बीस से अध्ािक जिलों के इलाके भी है। तीस प्रतिशत से अध्ािक बैंकिंग सेवा के उपयोग वाला एक भी गांव प्रदेश मंे नहीं है।
60 हजार गांवों तक पहुंची ही नहीं बैंकिंग-
देश में 82 हजार से अध्ािक बैंक शाखाएं होने के बावजूद केवल पांच प्रतिशत ग्रामीण सेक्टर को ही कवर किया है। भारतीय रिजर्व बैंक ने वर्ष-2006 में ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सेवाओं के विस्तार के लिए सत्तर हजार बैंक शाखाओं को जीरो बैलंेस (नो फ्रिल अकाउंट) पर खाते खुलवाने के निर्देश दिए थे। बावजूद इसके बैंक केवल शहरी क्षेत्रों को फोकस करते रहे। इससे अभी भी देश में साठ हजार से अध्ािक ऐसे गांव हैं, जहां की आबादी दो हजार से अध्ािक है और उन्होंने कभी बैंकिंग सेवाओं का उपयोग नहीं किया है। विकसित राज्यों के ग्रामीण क्षेत्रों में भी बैंकिंग सेवाएं पहुंच बनाने में असफल साबित हुई है।
मध्यप्रदेश के 10 से 20 प्रतिशत उपयोग वाले जिले-
शाजापुर, राजगढ़, गुना, शिवपुरी, श्योपुर, मुरैना, भिंड, ग्वालियर, दतिया, टीकमगढ़, विदिशा, सागर, नरसिंहपुर, छिंदवाड़ा, सिवनी, बालाघाट, मंडला, डिंडौरी, उमरिया और जबलपुर।
मध्यप्रदेश के 20 से 30 प्रतिशत उपयोग वाले जिले-
नीमच, मंदसौर, रतलाम, झाबुआ, ध्ाार, इंदौर-निमाड़, बड़वानी, उज्जैन, शाजापुर, देवास, हरदा, बैतूल, सीहोर, राजगढ़, भोपाल, शहडोल, सीध्ाी, कटनी, पन्न्ा, सतना, छतरपुर और रीवा।
सबसे पीछे उड़ीसा-
ग्रामीण क्षेत्र में बैंकिंग के मामले में देश में सबसे पीछे उड़ीसा है। उड़ीसा के आध्ो ग्रामीण क्षेत्रों में दस प्रतिशत से भी कम बैंकिंग सेवाएं रिकार्ड की गई है। वहीं बाकी आध्ो में दस से बीस प्रतिशत पहुंच बन सकी है। इसी तरह बिहार के हाल है। यहां भी आध्ाा बिहार दस प्रतिश से कम में और आध्ाा दस से बीस प्रतिश्ात के दायरे में आता है।
दिल्ली का दिल भी दुखा-
देश की राजध्ाानी दिल्ली में भी महज 30 से 40 प्रतिशत ग्रामीण इलाकों तक बैंकिंग सेक्टर पहुंच सका है। इसके अलावा देश में मात्र हिमाचल प्रदेश पूरा 40 से 50 प्रतिशत के दायरे में हैं। इसके अलावा महाराष्ट्र में मुंबई से लगा इलाका भी इसी दायरे में आता है।
तीन राज्य 60 प्रतिशत से आगे-
देश में केवल तीन राज्य ऐसे पाए गए हैं, जहां साठ प्रतिशत से अध्ािक ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सेवा पहुंची है। इसमें गोवा को पूरी तरह साठ प्रतिशत से ऊपर पाया गया है। वहीं जम्मू-कश्मीर में जम्मू से लगा कुछ इलाका इस दायरे में आता है। इसके अलावा केरल का त्रिवेंदुपुरम् से लगा इलाका भी साठ प्रतिशत से अध्ािक दायरे में है।
बॉक्स . . .
देश में ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सेवाएं-
राजस्थान- 20 से 30 प्रतिशत अध्ािकतर क्षेत्र मंे।
गुजरात- आध्ाा 10 से 20 व आध्ाा 20 से 30 प्रतिशत। गांध्ाीनगर से लगा इलाका 30 से 40 प्रतिशत।
गोवा- पूरा साठ प्रतिशत से अध्ािक।
महाराष्ट्र- मिश्रित। मुख्यत: 20 से 30 प्रतिशत। कुछ 30 -40, कुछ 40-50 व कुछ 10 से20 प्रतिशत।
कर्नाटक- पूरा 10 से 20 प्रतिशत।
तमिलनाडू- पूरा 10 से 20 प्रतिशत।
केरल- पांडिचेरी से लगा इलाका 20 -30 व कुछ 30-40 प्रतिशत। त्रिवेंद्रीपुरम क्षेत्र 60 प्रतिशत।
आंध्ा्रप्रदेश- पूरा 20 से 30 प्रतिशत।
मध्यप्रदेश- मुख्यत: 20 से 30 प्रतिशत। कुछ 10 से 20 प्रतिशत।
छत्तीसगढ़- आंध्ा्र व रायपुर से लगा इलाका 20 से 30 प्रतिशत और बाकी 10 से 20 प्रतिशत।
उड़ीसा- दस प्रतिशत से कम।
पश्चिम बंगाल- पूरा 10 से 20 प्रतिशत।
जम्मू-कश्मीर- जम्मू से जुड़ा इलाका 60 प्रतिशत से अध्ािक। बाकी 20 से 30 प्रतिशत।
हिमालच प्रदेश- 40 से 50 प्रतिशत।
उत्तरप्रदेश- 30 से 40 प्रतिशत
दिल्ली- 30 से 40 प्रतिशत।
पंजाब- मुख्यत: 20 से 30 व कुछ इलाका 30 से 40 प्रतिशत।
हरियाणा- आध्ाा 10 से 20 प्रतिशत और आध्ाा 30 से 40 प्रतिशत।
बिहार- मुख्यत: 10 से 20 प्रतिशत। कुछ 10 प्रतिशत से कम भी।
आसाम- 10 से 20 प्रतिशत।
(मिजोरम, नागालैंड, अरूणाचल, म्यांमार, मेघालय और सिक्किम के डाटा आयोग को मिले नहीं थे।)

नोट- खबर के साथ देश या प्रदेश का ग्रामीण बैंकिंग सेवा दर्शाता नक्शा दिया जा सकता है। यह नक्शा विशेष रुप से रिपोर्ट में दिया गया है। इस कारण इसे प्रकाशित करना है, तो डिजाइन कराना पड़ेगा।

तमिलनाडू की हवाओं से रोशन होगा मध्यप्रदेश!

- कें्रदीय ऊर्जा आयोग ग्रिड कंट्रोल में लेगा सौर-पवन ऊर्जा को
- सभी राज्यों में बंटवारा होगा गैर-पारंपरिक ऊर्जा का
- मध्यप्रदेश की बिजली समस्या से मिलेगी कुछ राहत

जितेन्द्र चौरसिया
भोपाल। तमिलनाडू की हवाओं के जरिए भी मध्यप्रदेश जल्द रोशन हो सकेगा। ऐसा देश के सभी राज्यों की सौर व पवन ऊर्जा को नेशनल ग्रिड कंट्रोल में लेने के कारण होगा। भारत सरकार ने ग्रिड कंट्रोल में पहली बार इन दोनों गैर-पारंपरिक ऊर्जा को शामिल करना तय किया है। इससे गैर-पारंपरिक ऊर्जा के क्षेत्र में पिछड़े मध्यप्रदेश को भी दूसरे राज्यों से सौर व पवन ऊर्जा मिल सकेगी।
वर्तमान में जो राज्य गैर-पारंपरिक ऊर्जा का उत्पादन करता है, वहीं सामान्यत: उसका उपयोग भी करता है। नई व्यवस्था में किसी भी राज्य में उत्पादित गैर-पारंपरिक बिजली जरुरत के अनुसार दूसरे राज्य को मुहैया कराई जाएगी। इससे मध्यप्रदेश सहित जिस भी राज्य के बाशिंदे बिजली संकट झेल रहे हैं, उनकी समस्या कम होगी। खास तौर पर पीकआवर्स की दिक्कतें कम होगी। ग्रिड से किस राज्य को कितनी गैर-पारंपरिक बिजली मिलेगी, इसका कोटा भी तय होगा। अभी तक नेशनल ग्रिड पर केवल ताप व पनबिजली का बंटवारा होता है। इसमें सौर व पवन ऊर्जा को शामिल करने का फैसला केंद्रीय ऊर्जा विनियामक आयोग ने कर लिया है। इसके तहत सभी राज्यों को एक ड्राफ्ट भेजकर सुझाव मांग गए हैं।
इसके तहत नेशनल ग्रिड कंट्रोल में सौर व पवन ऊर्जा के आने पर मध्यप्रदेश को भी उन राज्यों की दोनों ऊर्जा का लाभ मिल सकेगा, जो गैर-पारंपरिक बिजली उत्पादन में आगे हैं। मसलन, देश में पवन ऊर्जा के क्षेत्र में सबसे अध्ािक उत्पादन तमिलनाडू में होता है। यहां चार हजार मेगवाट पवन ऊर्जा बनती है। तमिलनाडू के अलावा देशभर में तटीय इलाकों वाले राज्य पवन ऊर्जा उत्पादन में आगे हैं। वहीं राजस्थान सौर ऊर्जा के मामले में आगे हैं। नई व्यवस्था में इन राज्यों की सौर व पवन ऊर्जा भी ग्रिड के जरिए बंटेगी। इससे हर राज्य को कम से कम सौर व पवन ऊर्जा मिलने का एक निश्चित पैमाना तय हो जाएगा। मध्यप्रदेश में अभी सौर व पवन ऊर्जा की स्थिति ठीक नहीं है, लेकिन इन दोनों ऊर्जा के ग्रिड कंट्रोल में आने पर मध्यप्रदेश का भी एक निश्चित कोटा तय रहेगा।
मप्र ने भेजे सुझाव-
मप्र ऊर्जा नियामक आयोग ने ड्राफ्ट पर अपने कोटे से लेकर गैर-पारंपरिक ऊर्जा को बढ़ावे संबंध्ाी सुझाव भेजे हैंं। इसके अलावा प्रदेश में सौर व पवन ऊर्जा की संभावनाआंे का खाका भी दिया गया है।
क्या होगा फायदा-
सौर व पवन ऊर्जा ग्रिड कंट्रोल के दायरे में आने पर मध्यप्रदेश की बिजली समस्या कुछ हद तक कम हो सकेगी। अभी मध्यप्रदेश मुख्यत: ताप व पनबिजली पर ही निर्भर है। ऐसे में अतिरिक्त रुप से सौर व पवन ऊर्जा का एक निश्चित कोटा मिलने से बिजली आपूर्ति बढ़ जाएगी। अभी गांवों में बमुश्किल आठ से नौ घंटे बिजली मिल पा रही है। इस स्थिति में बदलाव आएगा। हालांकि अभी यह तय नहीं है कि कितना कोटा मप्र को मिल सकेगा, किंतु कुल गैर-पारंपरिक बिजली का पांच से दस प्रतिशत भी मिलता है, तो प्रदेश को काफी राहत मिलेगी। इसके अलावा प्रदेश में गैर-पारंपरिक ऊर्जा उत्पादन की संभावनाएं बढ़ेंगी।
नियमों में अध्ािक आसानी-
ग्रिड से सामान्य बिजली लेने की अपेक्षा गैर-पारंपरिक बिजली के नियमांे में अध्ािक आसानी रहेगी। यदि निर्ध्ाारित कोटे से अध्ािक बिजली ली जाती है, तो उस पर लगने वाले अनशेड्यूल इंटरचार्जेस (यूआई) ंमें भी अध्ािक छूट रहेगी। अभी इसके नियम तैयार किए जा रहे हैं। गैर-पारंपरिक बिजली ताप व पनबिजली की अपेक्षा महंगी रहती है, लेकिन ग्रिड कंट्रोल में आने पर यह उतनी महंगी नहीं रहेगी। केंद्र सरकार इसे राज्योंं को मूल लागत पर उपलब्ध्ा कराने की कोशिश करेगी। ड्राफ्ट फायनल होने के बाद कीमतें तय की जाएंगी।
अलग नियंत्रण सिस्टम-
गैर-पारंपरिक ऊर्जा के लिए नेशनल ग्रिड पर पूरी तरह अलग कंट्रोल रहेगा। इसका अलग कोटा होगा और उसके संचालन के लिए इसी ग्रिड पर पूरा अलग सिस्टम रहेगा। ड्राफ्ट फायनल होने के बाद इस पर काम शुरु होगा।
मध्यप्रदेश में सौर-पवन ऊर्जा-
गैर-पारंपरिक ऊर्जा उत्पादन में अभी मध्यप्रदेश भले ही पिछड़ा हो, लेकिन सपने स्वर्णिम है। मध्यप्रदेश ने वर्ष-2013 तक 200 मेगावाट सौर ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य रखा है, जबकि अभी विकेन्द्रीत रुप से एक से दो मेगावाट उत्पादन ही हो रहा है। वहीं पवन ऊर्जा में 167 मेगावाट उत्पादन हो रहा है, जिसे अगले एक साल में 400 मेगावाट तक करने का लक्ष्य रखा गया है। मध्यप्रदेश ऊर्जा विकास निगम के इंचार्ज चीफ इंजीनियर भुवनेश पटेल का कहना है कि गैर-पारंपरिक ऊर्जा के स्त्रोत तेजी से बढ़ाए जा रहे हैं। अभी बैतूल, देवास, ध्ाार, बड़वानी, शाजापुर, रतलाम और मंदसौर को पवन ऊर्जा उत्पादन का केंद्र बनाया जा रहा है।
ताप व पनबिजली की स्थिति-
वर्तमान में मध्यप्रदेश का ताप व पनबिजली परिदृश्य ठीक नहीं है। औसत 5000 से 5500 मेगावाट बिजली की मांग रहती है। वहीं कुल उत्पादन औसत 2500 से 2800 मेगावाट रहता है। दो हजार मेगावाट बिजली नेशनल ग्रिड से मिलती है। ऐसे में औसत 500 से 1000 मेगावाट बिजली का अंतर मांग व आपूति में बना रहता है, जिसके कारण आम आदमी को कटौती की मार सहना पड़ती है। गैर-पारंपरिक बिजली का ग्रिड से अलग कोटा मिलने पर इस अंतर में कमी आएगी।
फैक्ट फाइल-
01 लाख 10 हजार मेगावाट कुल बिजली उत्पादन देश में
2500 से 3000 मेगावाट कुल बिजली उत्पादन प्रदेश में
15000 मेगावाट गैर-पारंपरकि ऊर्जा उत्पादन देश में
167 मेगावाट पवन ऊर्जा उत्पादन मध्यप्रदेश में
02 मेगावाट औसत सौर ऊर्जा उत्पादन मध्यप्रदेश में

प्रदेश के इतिहास में सबसे महंगी बिजली

- प्रदेश के इतिहास में तीसरा तगड़ा झटका
- पांच साल में पहली बार इतनी दर बढ़ी
- 2001-02 में बढ़ी थी 14.73 प्रतिशत

जितेन्द्र चौरसिया
भोपाल। प्रदेश के इतिहास में तीसरी बार दस प्रतिशत से अध्ािक बिजली दरें बढ़ाई गई है। इससे पहले वर्ष-2001-02 में 14.73 प्रतिशत और 2004-05 में 14.47 प्रतिशत दर बढ़ी थी, लेकिन बीते पांच सालों से दर बढ़ोत्तरी पांच प्रतिशत के अंदर सिमटी रही। अब 10.66 प्रतिशत दर बढ़ने से आम आदमी के साथ सरकार भी चिंता में है। हालांकि केवल कीमत के लिहाज से देखे, तो इस साल उपभोक्ता प्रदेश के इतिहास की सबसे महंगी बिजली लेगा।
मप्र विद्युत नियामक आयोग ने पहली बार 2001-02 में बिजली दरें घोषित की थी। प्रदेश के इतिहास में सबसे अध्ािक दर बढ़ोत्तरी 2001-02 में 14.73 प्रतिशत हुई थी। इसके बाद 2004-05 में 14.47 प्रतिशत औसत दर बढ़ाई गई। इसके बाद से 2006-07 में करीब पांच प्रतिशत दर बढ़ाई गई थी। वहीं पिछले साल 2009-10 में 3.61 प्रतिशत दर बढ़ोत्तरी की गई। इसके अलावा 2007-08 में मात्र एक प्रतिशत और 2008-09 में तीन प्रतिशत दर बढ़ोत्तरी की गई थी। आयोग सदस्य (इंजीनियरिंग) केके गर्ग भी स्वीकारते हैं कि पिछले चार-पांच साल में यह सबसे अध्ािक बढ़ोत्तरी है। उनका कहना है कि इस बढ़ोत्तरी के अलावा कोई चारा नहीं था। दरअसल, इस साल महाराष्ट्र, दिल्ली और उत्तरप्रदेश की बिजली से मध्यप्रदेश की तुलना करना भी उपभोक्ताओं को भारी पड़ गया है। इन राज्यों की औसत लागत के अध्ययन के बाद हीं मध्यप्रदेश में बिजली लागत तय की गई। इन राज्यों में कही भी चार रुपए से कम औसत लागत नहीं है। एसे में मप्र में बिजली की लागत पिछले साल की 3 रुपए 71 पैसे प्रति यूनिट से बढ़ाकर 4 रुपए 22 पैसे आंकी गई है। उस पर ट्रांसमिशन सहित अन्य खर्चों को पाटने के लिए उपभोक्ताओं की जेब खाली करना तय कर लिया गया। नतीजा यह कि उपभोक्ताओं पर एक हजार नौ करोड़ का अतिरिक्त बोझ डाल दिया गया।
सरकार सबसिडी पर चिंतित-
बिजली दरों में 10.66 प्रतिशत बढ़ोत्तरी के बाद राज्य सरकार भी चिंता में आ गई है। अभी सरकार करीब तेरह सौ करोड़ रुपए सालाना किसानों और एकबत्ती कनेक्शन पर सबसिडी देती है। दर बढ़ोत्तरी के बाद इसमें भी करोड़ों की बढ़ोत्तरी होना है। आगामी साल में चुनाव नहीं है, इस कारण सरकार इसमें कमी भी कर सकती है, लेकिन ऐसा करने की स्थिति में संबंध्ाित उपभोक्ता को राशि चुकाना होगी। मंगलवार को बिजली महकमे के अफसर बढ़ने वाली सबसिडी के गुणा-भाग में लगे रहे। जल्द ही इस पर रिपोर्ट भी तैयार की जाएगी।
कब कितनी दर बढ़ोत्तरी- (प्रतिशत में )
2001-02- 14.73
2004-05- 14.47
2006-07- 05.00
2007-08- 01.00
2008-09- 03.00
2009-10- 3.61
2010-11- 10.66
नोट- वर्ष-2006 के पहले आयोग ने नियमित रुप से हर साल दर घोषित नहीं की थी।