Thursday, August 26, 2010

Wednesday, August 25, 2010

Monday, August 23, 2010

Monday, August 16, 2010

Saturday, August 14, 2010


'गारंटी" कितनी?


ऑडिट: लोकसेवा गारंटी अध्ािनियम

जितेन्द्र चौरसिया
भोपाल। आम आदमी की समस्याएं बड़ी 'आम" है, फिर भी खास और आम मिलकर भी बरसों में इनका इलाज नहीं ढूंढ सके। अब लोकसेवा गारंटी अध्ािनियम लाया गया है, लेकिन यह बेहतर लोकसेवा की कितनी गारंटी दे सकेगा, क्योंकि सरकारी दफ्तरों में अनगिनत अर्जियां बाबुओं की टेबलों पर बरसों आगे बढ़ने का इंतजार करती रहती हैं। कहीं पैसे की खनक, तो कहीं रुतबे की ध्ामक भले ही काम को तेज गति से करा दें, मगर जब बात आम आदमी की हो तो घंटों का काम दिनों, दिनों का काम महीनों और महीनों का काम सालों में करने का किस्सा आम है। कई लोकहितकारी योजनाएं बीते सालों में आम आदमी का दर्द भांपने की कोशिश करती रहीं। बावजूद इसके सरकारी दफ्तर में शिकायतों और परेशान लोगों की कतारें ज्यों की त्यों हैं। कभी प्रबंधन के अभाव, कभी अमले की कमी तो कभी निचले कर्मचारियों के असहयोग के कारण हर योजना के सार्थक परिणाम देखने को नहीं मिले।


ज्ञानदूत योजना-
कांग्रेस शासनकाल में ज्ञानदूत योजना चर्चित हुई थी। धार जिले से प्रारम्भ हुई यंोजना में तकनीक का सहारा लिया गया। ई-क्रांति के रूप में ज्ञानदूत योजना को अन्य जिलों में भी लागू किया गया। योजना थी कि कम्प्यूटर का इस्तेमाल कर तंत्र को साधन संपन्न् बनाया जाए और खसरा नकल, जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र सहित तमाम कार्यों के लिए ग्रामीणों को जिला मुख्यालय तक बार-बार न आना पड़े। कम शुल्क पर सुविधा देने के लिए निजी कम्पनियों को ठेके दे कर जनपद स्तर तक ज्ञानदूत केन्द्र प्रारम्भ किए गए लेकिन बाद में शिकायतें मिलने लगी कि इन केन्द्रों के संचालकों ने ही ज्यादा पैसे लेने शुरू कर दिया था। जिस काम के लिए ज्ञानदूत केन्द्र प्रारम्भ किए गए थे, उसी के लिए समाधान केन्द्र प्रारम्भ होने के बाद ज्ञानदू्त केन्द्रों को बंद कर दिया गया। आलम यह है कि अब योजना के अते-पते नहीं हैं। अफसरशाही को तो यहां तक भी याद नहीं कि ऐसी कोई योजना थी भी।


समाध्ाान केन्द्र-
यह यंोजना भाजपा शासनकाल मंें अस्तित्व में आई। इस एकल खिड़की योजना के तहत जिला मुख्यालयों पर विशेष केन्द्र बनाए गए और करीब एक दर्जन ज्यादा तरह के प्रमाण पत्रों के लिए एक जगह पर आवेदन लेने और वहीं से प्रमाण पत्र देने की व्यवस्था शुरू हुई। डिप्टी कलेक्टर स्तर के अधिकारी को केन्द्र का प्रभारी बनाया गया। इसमें सारे दस्तावेज और तय शुल्क देने के बाद हस्ताक्षर आदि के लिए प्रभारी अध्ािकारी तक बार-बार जाने से मुक्ति मिल गई। शुस्र्आत में व्यवस्था ठीक चली लेकिन बाद में केन्द्र पर आवेदन पत्रों का टोटा बताया जाने लगा और कार्यालय के बाहर दलाल 50 पैसे के फार्म को 5 स्र्पए में बेचने लगे, इतना ही नहीं काम जल्दी करवाने के नाम पर दलाल ही सारे दस्तावेज लेकर 'एकल खिड़की" का फायदा उठाने लगे। जाहिर है व्यवस्था पंक्चर हो चुकी है। आज केन्द्र खुले हैं लेकिन दलाल फलफूल रहे हैं।



समाध्ाान ऑनलाइन-
इस व्यवस्था के तहत कोई भी व्यक्ति टोल-फ्री नंबर के जरिए या ऑनलाइन शिकायत कर सकता है। पहले स्थानीय अफसर संबंधित व्यक्ति की समस्या का निराकरण करते हैं। फिर समस्या जिला और संभाग के स्तर पर होते हुए मुख्यमंत्री तक आती है। आवेदक शिकायत नंबर के जरिए प्रकरण की प्रगति हर दिन जांच सकता है। सरकारी रिकार्ड के मुताबिक मुख्यमंत्री सचिवालय स्तर पर पर वर्ष-2006 से अगस्त-2010 की स्थिति में केवल सात शिकायतें पेंडिंग हैं। हकीकत यह है कि अध्ािकतर पीड़ित अभी भी इस सेवा का उपयोग नहीं करते। वजह यह कि प्रदेश की आध्ाी से ज्यादा आबादी अभी भी तकनीक फ्रेंडली नहीं है। उस पर तहसील, जिला व संभाग स्तर पर ही समस्या के निराकरण की कवायद में महीनों और सालों लग जाते हैं। अध्ािकतर मामलों में स्थानीय स्तर पर पीड़ित को गुमराह कर दिया जाता है।



टेली समाधान कॉल सेंटर-
25 सितंबर 2008 को शुरू हुई इस योजना में 52 विभागों की योजनाओं की जानकारी दी जाती है और 15 विभागों की समस्याएं हल की जाती हैं। यहाँ जून-2010 तक पांच लाख से अधिक लोगों ने कॉल किया और ग्यारह हजार से अधिक शिकायतें हल की गईं।



परख-
इस कार्यक्रम में मुख्यत: गांवों को आध्ाार बनाकर बिजली, पानी, स्वास्थ्य सहित 14 बुनियादी सेवाओं के कामकाज की जमीनी हकीकत पता करने प्रशासनिक अमला तहसील और गांव स्तर तक जाता है। हर महीने जानकारी एकत्र करके समीक्षा होती है। महीने में एक बार मुख्यमंत्री भी समीक्षा करते हैं। समाध्ाान के लिए मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव, सचिव और संभाग, जिला व अनुविभाग स्तर पर मॅानीटरिंग है। इस कार्यक्रम के साथ दिक्कत यह रही कि प्रशासनिक दौरेे के दौरान जो समस्याएं सामने आई, उनके समाध्ाान के जमीनी प्रयास दिखाई नहीं देते। मॉनीटरिंग से कई स्थानों पर सुधार जरूर हुआ, लेकिन वह स्थाई नहीं हो सका। हजारों हैंडपंप खराब होने, ट्रांसफार्मर चोरी जैसी समस्याएं बस दर्ज होकर रह गईं। संबंध्ाित विभागों से तालमेल के अभाव में इनका कोई समाध्ाान नहीं हो सका।



जनदर्शन-
2007-08 में शुरू हुआ मुख्यमंत्री का जनदर्शन कार्यक्रम भी अब लगभग बंद हो चुका है। जनता के हाल जानने के लिए मुख्यमंत्री हर महीने एक दौरा करते थे। इसमें आकस्मिक व पूर्व सूचना दोनों आध्ाार पर दौरे होते थे। जब-जब मुख्यमंत्री ने जनदर्शन किया अफसरशाही की पोल खुलती गई, लेकिन मुख्यमंत्री की विभिन्न् व्यस्तताओं के कारण कई महीने बिना 'जनदर्शन" गुजरे और अब यह लगभग बंद सा हो गया है। स्वाभाविक है अफसरशाही नहीं चाहेगी कि सरकार सीध्ो जनता से मुखातिब हो।



जनसुनवाई-
जन समस्या के समाध्ाान के लिए यह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की पंसदीदा योजना कही जा सकती है। उन्होंने हर मंगलवार को राज्य, संभाग, जिला, तहसील और गांव स्तर तक जनसुनवाई के निर्देश दिए। विभाग प्रमुख न केवल जनता की बात सुनते हैं बल्कि मौके पर उनके निराकरण की कार्रवाई भी करते हैं। जन सुनवाई जारी है लेकिन उसका जमीनी असर कम होता जा रहा है। अध्ािकांश मामलों में एक विभाग से की गई अनुशंसा दूसरे विभाग में लंबित पड़ी रहती है। इतना ही नहीं कई बार उन्हीं अफसरों को जाँच का जिम्मा दे दिया गया जिनके खिलाफ शिकायत की गई थी। जमीन और पुलिस के मामलों में परेशान लोग आज भी इसी योजना में शिकायत कर राहत अनुभव कर रहे हैं।



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क्या है लोकसेवा गारंटी-


मध्यप्रदेश लोकसेवाओं के प्रदान की गारंटी विधेयक 2010 के तहत अध्ािकारी-कर्मचारी को निर्ध्ाारित समय में आवेदक को सेवा देना कानूनी तौर पर अनिवार्य किया गया है। सिटीजन चार्टर में कार्रवाई के प्रावध्ाान नहीं थे। इसमें रखे गए हैं।



रोजाना 250 रूपए जुर्माना-


अध्ािकारी-कर्मचारियों पर न्यूनतम 250 रुपए प्रतिदिन जुर्माना लगेगा। यह राशि आवेदक को दी जाएगी। प्रकरण के आध्ाार पर अनुशासनात्मक कार्रवाई भी संभावित। अपीलीय अध्ािकारी पर भी 500 से 5000 रुपए तक जुर्माना लग सकेगा।



शुरूआत में ये सेवाएं दायरे में-


जन्म-जाति और मूल निवासी प्रमाण-पत्र का प्रदाय, खसरा-खतौनी की नकल का प्रदाय, बिजली-नल कनेक्शन और आम आदमी से सीध्ो तौर पर जुड़ी अन्य सेवाएं।



आगे यह-


हर प्रकार की फाइल की समयावध्ाि तय करना कि किस अध्ािकारी-कर्मचारी के पास कितने दिन रहेगी। मंत्री और विध्ाायकों को भी इस दायरे में लाना। प्रभावी क्रियान्वयन की व्यवस्था निर्मित करना। सरकार ने लोक सेवा प्रबंध्ान विभाग बनाने पर भी विचार-विमर्श शुरु कर दिया है।


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समाध्ाान आनलाइन की स्थिति-
प्रदेश में अब तक आवेदन- १९९६२६


निराकरण के लिए लंबित आवेदन- ३४२४


सीएम सचिवालय स्तर पर लंबित- ०७


निराकृत आवेदन- १९६२०२



परख में दर्ज समस्याएं-



स्कूलों के हाल-
भवन विहीन स्कूल- ७८५५


पेयजल नहीं- १९२०८


बाथरुम नहीं- ३४७०९


शौचालय नहीं- ४५५५७



स्वास्थ्य सेवाएं-
कुल गांव- ५४६७९


उप स्वास्थ्य केंद्र गांवों में- ८६६२


प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र- ११२२



हैंडपंप सेवा-
प्रदेश के गांवों में कुल हैंडपंप- ४३०७१९


ऐसे हैंडपंप जिनके आसपास पानी की निकासी नहीं- ३५४४४


ऐसे हैंडपंप जहां पर रिचार्जिंग की व्यवस्था नहीं- २८४५६०



पशु चिकित्सा सेवा-
प्रदेश में कुल गांव- ५४६७९


ऐसे गांव जहां पशु चिकित्सा केंद्र नहीं- ३४६३


ऐसे पशु चिकित्सा केंद्र जिनके भवन नहीं- 1229
इनका कहना-
कर्मचारियों से समय पर काम करवाना हमेशा ही बड़ी चुनौती रहा है। लोक सेवा गारंटी कानून को लागू करने में भी वही दिक्कतें आएँगी जो हमेशा से आती रही हैं। इस व्यस्था को लागू करने में समस्या ज्यादा है लेकिन शासन की इच्छाशक्ति इसे मुमकिन बना सकती है। यह सुझाव बेहतर है कि समय-सीमा खत्म होने के बाद प्रकरण सीध्ोे अपीलीय अध्ािकारी के पास चला जाए। इस तरह आवेदक को बार-बार शिकायतें लेकर न आना पड़ेगा।
- केएस शर्मा, पूर्व मुख्य सचिव, मप्र


यह हास्यास्पद है कि कर्मचारी सरकार की नहीं सुनते और उनसे समय पर काम करवाने के लिए सरकार को कानून बनाना पड़ रहा है। जो कर्मचारी अभी काम करने के लिए बाध्य नहीं हैं वे इस कानून का पालन कैसे करेंगे? मेरा मानना है कि कानून तब लाना चाहिए जब कोई और रास्ता न बचा हो। यदि कलेक्टर अपने अध्ाीनस्थों, एसडीओ अपने अध्ाीनस्थों, तहसीलदार अपने अध्ाीनस्थों के काम पर निगरानी रखें उन्हें समय पर काम करने के लिए बाध्य करें, तो इस कानून की जरूरत ही नहीं होगी।


- एमएन बुच, सेवानिवृत्त आईएएस

Thursday, August 12, 2010

जेम्सबॉंड की 'आईरिस स्केनिंग" अब रूबरू होगी गरीबों से!


- मप्र में गरीबों के बाद आएगा अमीरों का नंबर
- खाद्य विभाग निजी एजेंसी से कराएगा स्केनिंग
- विशेष पहचान पत्र के तहत हर व्यक्ति दायरे में

जितेन्द्र चौरसिया
भोपाल। दुनिया में वर्ष-1980 में जेम्सबांड फिल्मों के जरिए वैज्ञानिक मिथक के रुप में पहली बार लोगों के सामने आई 'आईरिस स्केनिंग" मध्यप्रदेश में सबसे पहले गरीबों से रुबरु होगी। सरकार पहले गरीबों का आईरिस स्केन कराएगी और उनके बाद अमीरों का नंबर आएगा। ऐसा विशेष पहचान-पत्र बनाने की व्यवस्था के पिछड़ने के कारण होगा। विशेष पहचान पत्र में आईरिस स्केंनिग पर अभी तक गाइडलाइन नहीं आई है। इसलिए मध्यप्रदेश सरकार के खाद्य महकमे ने गरीबों के कार्ड में आईरिस स्केनिंग को अपनाना तय कर लिया है। इसके टेंडर भी हो चुके हैं।
विशेष पहचान-पत्र बनाने की प्रक्रिया मार्च-2011 से शुरु होगी। उस पर आइरिस स्केनिंग को लेकर भी अभी तक भारत सरकार से कोई गाइडलाइन नहीं आई है। इस कारण मध्यप्रदेश के खाद्य विभाग ने पहले ही गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वालों की आईरिस स्केनिंग कराना तय कर लिया है। सूत्रों के मुताबिक करीब साढ़े सात सौ करोड़ रुपए केवल गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वालों के बायोमीट्रिक व आईरिस स्केन वाले कार्ड तैयार करने में लगेंगे। इतनी रकम का एकदम बंदोबस्त करना मुश्किल है। इसलिए सरकार ने निजी सेक्टर के भरोसे यह व्यवस्था लागू करना तय किया है। इसमें निजी एसेंजी को ही बायोमीट्रिक व आईरिस स्केनिंग उपकरण लगाने होंगे। बाद में जब संबंध्ाित एजेंसी कार्ड तैयार करके देगी, तभी खाद्य विभाग भुगतान करेगा। यह भुगतान प्रति कार्ड के आध्ाार पर होगा, जिसका रेट तय करने के लिए टेंडर बुलाएं गए हैं। सरकार की मंशा है कि विशेष पहचान-पत्र के तहत आइरिस स्केन प्रक्रिया शुरु होने के पहले ही गरीबों के आईरिस डाटा कार्ड तैयार कर लिए जाए। इससे बाद में यही डाटा कार्ड विशेष पहचान-पत्र के लिए भी उपलब्ध्ा कराए जा सकेंगे।

पिछड़ी पहचान-पत्र प्रक्रिया-
विशेष पहचान-पत्र बनाने की प्रक्रिया पर अभी स्थिति पूरी तरह साफ नहीं है। अभी जनगणना का डाटा तैयार किया जा रहा है। इसी के साथ चौदह बिंदुओं का एक अन्य रजिस्टर भी है, जिसकी जानकारी को बाद में विशेष पहचान-पत्र के लिए उपयोग किया जाएगा। विशेष पहचान पत्र में फिंगरप्रिंट, फोटो और आइरिस स्केनिंग होगी। मार्च-2011 से इसकी शुरुआत होना है, लेकिन किस तरह और कैसे इस पर अभी कोई गाइडलाइन नहीं आई है। यहां तक कि आइरिस स्केनिंग जैसी महंगी व उच्च तकनीक का इस्तेमाल कैसे होगा इस पर भी कोई दिशा-निर्देश नहीं आए हैं।

दस हजार करोड़ से अध्ािक की जरुरत-
जनगणना-2001 के अनुसार छह करोड़ आबादी का आईरिस स्केन कराने में ही करीब दस हजार करोड़ की जरुरत है। उस पर जनगणना-2011 के तहत तो आबादी और खर्च दोनों बढ़ जाएंगे। ऐसे में आइरिस स्केनिंग बहुत महंगी और दुश्कर साबित होना है। अभी खाद्य विभाग ने केवल गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वालो की आइरिस स्केनिंग व डाटा कार्ड तैयार करने में साढ़े सात सौ करोड़ खर्च होने का अनुमान लगाया है। इसमें साढ़े तीन सौ करोड़ तो केवल स्थापना का खर्च रहेगा। इतने खर्च के कारण ही निजी सेक्टर को अपनाया गया है।

क्या है आइरिस स्केनिंग-
आइरिस स्केनिंग व्यक्ति की पहचान सुनिश्चित करने की सबसे उत्कृष्ट तकनीक है। दो व्यक्तियों की आंखों की पुतली कभी एक जैसी नहीं होती। भले ही वे दोनों जुड़वां हो। इस कारण इस तकनीक में आंखों की पुतली की स्केनिंग करके डिजीटल इमेज बनती है। वैश्विक मानकों के तहत यह विश्व की सबसे सुरक्षित पहचान प्रणाली है। इसमें बारह लाख में कोई एक केस में गलती होने की आशंका रहती है।

जेम्सबॉंड ने कराया परिचय-
आइरिस स्केनिंग प्रणाली सबसे पहले लोगों के सामने वर्ष-1980 में जेम्सबॉंड की फिल्मों में आई। तब इसे खूब पसंद किया गया। हालांकि इसकी खोज 1936 में नेत्र रोग विशेषज्ञ डा। फैं्रक बर्च ने की थी, लेकिन जेम्सबॉंड की फिल्मों के आने तक भी इसे वैज्ञानिक फंतासी (मिथक)के रुप में ही देखा जाता था। इसके बाद वर्ष-1987 में आरन सफिर और लियोनर्ड फ्लोम ने इस प्रणाली का पेटेंट कराया। इसके बाद वर्ष-1989 में हावर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जॉन डॉगमर्न ने इस पर रिसर्च की और परिष्कृत करके 1994 पेटेंट कराया। इसके बाद ही इस तकनीक को अपनाया गया। पाकिस्तान में शरणार्थी अफगानियों की पहचान के लिए यह प्रणाली उपयोग की गई। वहीं अमेरिका में सुरक्षा स्टॉफ में इसे अपनाया जाता है। सिंगापुर और ब्रिटेन में भी इस तकनीक का प्रयोग किया जाता है।
पहचान के लिए अपनाई जाने वाली तकनीकें-

तकनीक गलती की संभावना
आईरिस स्केनिंग 12 लाख पर 01
फिंगरप्रिंट 1००० पर 0१
हैंड शेप (हथेली की छाप) 7०० पर 01
चेहरा पहचान 100 पर 01
हस्ताक्षर 100 पर ०१
वाइस-पहचान 30 पर 01
(वैश्विक स्टेण्डर्ड के अनुसार)

फैक्ट फाइल-
750 करोड़ केवल गरीबों के आइरिस स्केन का खर्च
350 करोड़ व्यवस्था स्थापित करने में खर्च होंगे
10 हजार करोड़ की सभी के आइरिस स्केन के लिए जरुरत
इनका कहना है-
हम अपनी कूपन व्यवस्था के तहत आइरिस कैप्चरिंग अपना रहे हैं। हम देश में सबसे पहले इस व्यवस्था को अपना रहे हैं। अभी तय नहीं, लेकिन संभव हुआ तो बाद में यही आईरिस स्केनिंग डाटा विशेष पहचान पत्र के लिए भी उपलब्ध्ा कराया जा सकता है।
- अशोक दास, प्रमुख सचिव, खाद्य विभाग, मध्यप्रदेश
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Monday, August 9, 2010

Wednesday, August 4, 2010