
Tuesday, October 19, 2010
Saturday, October 16, 2010
Thursday, October 14, 2010
सूचना के अधिकार पर न्यायपालिका कंजूस
- मुख्य सूचना आयुक्त पद्मपाणि तिवारी से नवदुनिया की विशेष बातचीत।
जिस न्यायपालिका ने सबसे पहले सूचना के अधिकार पर सबसे पहले बात की, वहीं अब सूचना के अधिकार पर तकलीफ महसूस करती है। न्यायपालिका सूचना के अधिकार के मामले में कंजूस है, लेकिन धीरे-धीरे सबको इस दायरे में आना होगा। जाने कितने कानून आए और खो गए, लेकिन यह पहला ऐसा कानून है, जो महज पांच साल में हर दफ्तर में नजर आता है। यह कहना है मध्यप्रदेश के मुख्य सूचना आयुक्त पद्मपाणि तिवारी का। सूचना के अधिकार दिवस के मौके पर उनसे नवदुनिया ने विशेष बातचीत की। पेश है बातचीत के मुख्य अंश--
0 सूचना के अधिकार को आप कितना सफल मानते हैं?
अपेक्षा से बहुत अध्ािक सफल, क्योंकि मानवाध्ािकार का कानून साठ बरस पहले आया, लेकिन नजर कहीं नही आता। इसी तरह कई कानून है, जो किताबों हैं मगर हकीकत में कम नजर आते हैं। इससे उलट सूचना का अधिकार कानून पांच साल में ही असरदार नजर आ रहा है। सरकारी अफसर इस अधिकार के डर से जिम्मेदार हो गए हैं।
0 इस कानून पर कितनी जागरुकता बढ़ी है, इसकी पहुंच कहां तक पहुंची?
हर सरकारी दफ्तर में इस अधिकार का असर दिख रहा है। अफसर जिम्मेदार हो रहे हैं। राजभवन से लेकर ग्राम पंचायत तक अधिकार का प्रभाव दिख रहा है, लेकिन जिनके लिए अधिकार जन्मा वे अभी इससे दूर हैं। राजस्थान में मजदूरों को सही मजदूरी दिलाने के अधिकार बनाया था, किंतु यही वर्ग इससे दूर है। इसलिए अधिकार को शहरों से आगे बढ़कर गांवों में जाना होगा। इसमें गैर सरकारी संगठन महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
0 प्रशासनिक तंत्र व न्याययिक तंत्र कितना इसे स्वीकार कर पा रहा है?
अफसरों में जिम्मेदारी काफी बढ़ी है। हर कहीं काम में जागरुकता आइ है। जहां तक न्यायपालिका व कानूनी संस्थानों की बात है, तो अभी भी वे सूचना देने में तकलीफ महसूस करते हैं। न्यायपालिका ने सबसे पहले इस कानून को बनाया, लेकिन वहीं इस पर कंजूस है। हालात दीपक तले अंध्ोरे जैसी है, लेकिन अभी या देर से सभी को इस पर पूरी तरह पारदर्शी होना पड़ेगा।
- इस अधिकार पर ब्लैकमेलिंग व दुरुपयोग को लेकर लगने वाले आरोप कितने सही हैं?
कभी-कभी लगता है कि यह अधिकार ब्लैमेलरों के हाथ में जा रहा है। कुछ मामलों में भ्रष्टाचार को रोकने के लिए बना अधिकार ही भ्रष्टाचार के लिए उपयोग हो रहा है, लेकिन उससे कई गुना अध्ािक इसका सही उपयोग हो रहा है। इस अध्ािकार के दुरुपयोग को सभी को मिलकर रोकना होगा। इसमें सामाजिक संगठन और सभी की जिम्मेदारी है।
- पांच साल के अर्से में मध्यप्रदेश में आप अपनी और सूचना के अधिकार की क्या उपलब्ध्ाि मानते हैं?
अभी तक पांच हजार से अध्ािक केस निपटाएं हैं। सभी फैसले महत्वपूण रहे, लेकिन मोटे तौर पर सम्पत्ति विवरण की घोषणा और वैध्ाानिक संस्थाओं को अधिकार के दायरे में लाना बड़े निर्णय रहे। वैध्ाानिक संस्थाओं ने तो पहले पूरी तरह इस अधिकार से दूरी बना ली थी। मुख्य निर्णय इस प्रकार हैं-
1- सम्पत्ति विवरण की घोषणा।
(इसके चलते आईएएस-आईपीएस को अपनी सम्पत्ति घोषित करना पड़ी)
2- वैध्ाानिक संस्थाआं को दायरे मंे लाना।
(लोकायुक्त संगठन के विरोध्ा के कारण इस पर काफी विवाद गहराया।)
3- लोकसेवकों को सीआर देखने का अधिकार।
(पहली बार अफसर अपनी गोपनीय चरित्रावली देख सके।)
4- विद्यार्थी को उत्तरपुस्तिका देखने का अधिकार।
(इससे पहले छात्र अपनी कॉपी नहीं देख पाते थे।)
5- पुलिस मुख्यालय व पुलिस को दायरे में लेना।
(पुलिस मुख्यालय ने बड़ी देर बाद इसे लागू किया।।)
0 मुख्य सूचना आयोग क्या ज्यादा काम के दबाव में हैं, अभी कितने केस लंबित हैं?
हम पांच हजार से अध्ािक केसों में फैसला दे चुके हैं, लेकिन अभी भी चार हजार से अध्ािक केस लंबित हैं। कम स्टॉफ के कारण इनके निपटारे में समस्या होती है। एक आयुक्त पर अध्ािकतम पांच सौ केस ही होना चाहिए, लेकिन अभी इसकी संख्या कई गुना है। हमारे अलावा केवल तीन आयुक्त है और केस चार हजार से ज्यादा हैं।
० अधिकार की व्यावहारिक दिक्कतें क्या हैं और कैसे दूर हो सकती हैं?
कई दिक्कतें हैं। कई बार लोग ऐसी भी जानकारियां मांग लेते हैं, जिनका रिकार्ड ही नहीं होता। दुश्मनी के चक्कर में लोगों को परेशान करने के लिए भी जानकारियां मांगी जाती हैं। वहीं अफसर भी अभी पूरी तरह अध्ािकार को लेकर सकारात्मक नहीं हुए हैं। यह व्यावहारिक दिक्कतें हैं, इन्हें जागरुकता के जरिए खत्म करना होगा।
0 इस अधिकार के जमीनी क्रियान्वयन के लिए सबसे जरुरत क्या है?
पहली जरुरत प्रचार-प्रसार है। इसके अलावा हर विभाग में पहले से पदस्थ अध्ािकारी को इस अधिकार का जिम्मा दिया गया है। इसकी बजाए इसके लिए अलग से अध्ािकारी की नियुक्ति जरुरी है। सूचना आयोग कार्यालय में स्टॉफ कम है। यहां आयुक्त की जरुरत है। अध्ािकार को लेकर गांवों में जागरुकता जरुरी है। पूरे समाज को इस अधिकार से जुड़ना होगा, तभी सही अमल हो सकेगा।
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