Wednesday, June 23, 2010

Tuesday, June 22, 2010

Saturday, June 12, 2010





पुलिस की वर्दी में भगाने की तैयारी थी एंडरसन को?

- वर्दी मंगाई गई, लेकिन जरुरत नहीं पड़ी थी।

जितेन्द्र चौरसियाभोपाल।गैस कांड के मुख्य आरोपी व यूनियन कार्बाइड के चेयरमैन वारेन एंडरसन को सुरक्षित दिल्ली भेजने के लिए पुलिस की वर्दी पहनाने की तैयारी थी। इसके लिए डीएसपी स्तर की वर्दी भी मंगा ली गई थी, लेकिन एयरपोर्ट पर हालात सामान्य थे। इस कारण बिना वर्दी के सूट में ही एंडरसन को दिल्ली रवाना कर दिया गया। एंडरसन की रवानगी पर बयानबाजी और कयासबाजी के बीच यह एक नई कहानी सामने आई है।

गैस कांड के समय पुलिस महकमे में ही महत्वपूर्ण पद पर रहे एक पुलिस अध्ािकारी ने नवदुनिया से खास बातचीत में यह कहा है। गैस कांड पर खुलकर बयानबाजी के बावजूद उक्त अध्ािकारी सामने नहीं आना चाहते। इसलिए नाम न छापने की शर्त पर उक्त सेवानिवृत्त अध्ािकारी बताते हैं कि गैस कांड के बाद जिस तरह का माहौल था, उसमें एंडरसन को दिल्ली सुरक्षित भेजने में कोई अड़चन न आए इसके लिए पुलिस की वर्दी का सहारा लेना तय किया गया था। इसके लिए बाकायदा डीएसपी स्तर की पुलिस की वर्दी भी बुला ली गई थी। सोचा गया था कि यदि एयरपोर्ट पर हालात बिगड़ते, तो डीएसपी की वर्दी पहनाकर एंडरसन को रवाना कर दिया जाता, ताकि कोई पहचान नहीं पाता। हालांकि एंडरसन की रवानगी के वीडियो साबित करते हैं कि इसकी नौबत नहीं आई । गुपचुप तरीके से एंडरसन की रवानगी तय होने के कारण अध्ािक लोगों को इसकी भनक ही नहीं लगी। इससे डीएसपी की वर्दी नहीं पहनाई गई और एंडरसन अपने सूट में ही रवाना हुआ। उक्त अध्ािकारी एंडरसन के साथ एक डीएसपी स्तर के अध्ािकारी के भी दिल्ली तक छोड़ने जाने की बात भी बताते हैं। हालांकि जिस विमान से एंडरसन रवाना हुआ था, उसके पायलेट सैय्यद हसन अली इसे नकारते हैं। उनके मुताबिक एंडरसन अकेला ही गया था। बाकी सभी झूठ बोल रहे हैं। एंडरसन व्हाईट शर्ट और डार्क मेहरुन कलर का सूट पहने था। अली एंडरसन की रवानगी पर बाकी सारी बातों को फर्जी बताते हैं।

Friday, June 11, 2010





सिमटती नर्मदा, बढ़ता बोझ

- पांच सालों में आध्ाा हुआ नर्मदा में बहाव।- बढ़ती आबादी से बढ़ रही है निर्भरता।
जितेन्द्र चौरसियाभोपाल। मध्यप्रदेश की जीवनरेखा नर्मदा सिमटती जा रही है, लेकिन उस पर बोझ बढ़ता जा रहा है। हालत इतने बिगड़ रहे हैं कि पिछले पांच सालों में बारहमासी नर्मदा में पानी आध्ाा हो गया है। पर्यावरण को लीलता 'अव्यवस्थित विकास" नर्मदा के लिए भी साल-दर-साल खतरे का सबब बन रहा है। यही हालत रही तो आने वाले समय में नर्मदा पर संकट गहरा सकता है। प्रदेश में नर्मदा के पानी को शहरों और गांवों में लाने पर कई योजनाएं बनाई जा रही हैं, लेकिन नर्मदा के संरक्षण के प्रयास नजर नहीं आते।
बरसों से बारहमासी नदी मानकर नर्मदा की उपेक्षा का नतीजा है कि पिछले पांच सालों में नर्मदा में पानी करीब आध्ाा हो गया है। केंद्रीय जल आयोग के खरगौन जिले के महेश्वर में नर्मदा जल को मापने के लिए लगाए संयंत्र से प्राप्त डाटा के मुताबिक वर्ष-2005 मंे नर्मदा में औसत 2823।58 मिलियन क्यूबिक मीटर जल बहाव था, जो वर्ष-2008-09 में घटकर महज 1351 मिलियन क्यूबिक मीटर रह गया है। यही फ्लो अभी भी बना हुआ है। वहीं नर्मदा पर निर्भरता की बात करें, तो एक अध्ययन के अनुसार अभी की तुलना में अगले एक दशक में चार गुना आबादी नर्मदा के पानी पर निर्भर हो जाएगी। ऐसे में जल बहाव कम होेने का यही फ्लो रहा, तो आने वाले समय में नर्मदा सूख सकती है। नर्मदा के सिमटते किनारे-नर्मदा किनारे के इलाकों की स्थिति भी ठीक नहीं है। गर्मियों में नर्मदा किनारे देखे जाएं, तो अध्ािकतर नदी, नाले, कुएं व तालाब सूखे हैं। कुओं का जलस्तर भी गिर चुका है। हजारों मूक पशु चारे और पानी के अभाव में दूर-दराज के क्षेत्रों से लाकर भगवान भरोसे नर्मदा किनारे के जंगलों में छोड़ दिए जाते हैं। नर्मदा की सहायक नदियां भी संकट में हैं। करीब एक दर्जन से अध्ािक नदियों की हालत बहुत खराब हैं। इनमें से कुछ सहायक नदियां तो गर्मियों में सूख जाती हंै।दोहरा संकट-नर्मदा जल कम होने के अलावा दूसरा कड़वा सच यह है कि जो पानी है, उसका भी उपयोग नहीं हो पा रहा है। नर्मदा जल का वर्ष-2024 में नया निर्ध्ाारण होना है, किंतु अभी तक मध्यप्रदेश ने अपने हिस्से के दस फीसदी पेयजल का भी उपयोग नहीं कर पा रहा है। नर्मदा से मप्र को 18.35 मिलियन एकड़ फीट (एमएएफ) पानी का हिस्सा मिला है, लेकिन अब तक केवल पांच एमएएफ पानी के उपयोग की क्षमता ही विकसित हो सकी है। इससे एक ओर जहां नर्मदा के अस्तित्व पर सवाल उठा हुआ है, वहीं दूसरी ओर मप्र के हिस्से का जल भी छीनने का खतरा है। जब वर्ष-2024 में जल का फैसला होगा, तो उस समय मौजूद जलराशि के आध्ाार पर होगा। इससे खतरा दोगुना है। क्या है कारण-नर्मदा जल बहाव में कमी आने का कारण बदलता पर्यावरण है। जंगलों के कटाव के कारण प्रदूषण बढ़ रहा है। इसका असर बारिश पर भी बढ़ रहा है। वहीं औद्योगिकीकरण व अन्य विकास का असर भी हुआ है। ध्ाार्मिक मान्यताओं के कारण भी नर्मदा प्रदूषित हो रही है। प्रदूषण बोर्ड की एक स्टडी के मुताबिक नर्मदा अपने उद्गम स्थल अमरकंटक कुंड पर सबसे अध्ािक मैली है। इसके पीछे भी बदलता पर्यावरण, बढ़ते पर्यटक, खनिज उत्खनन आदि हैं। जाने कहां गए वो दिन-नर्मदा में पानी कम होने का अंदाजा इससे लगता है कि वर्ष-1983 में 39 अरब 24 करोड़ 47 लाख क्यूबिक मीटर पानी बहाव था। यह रिकार्ड बहाव है। ओंकारेश्वर के समीप मोरटक्का जल मापक संयंत्र के डाटा के मुताबिक वर्ष-1980 के जून से अक्टूबर के वर्षाकाल में 38 अरब 3 करोड 56 लाख क्यूबिक मीटर पानी नर्मदा में बहकर गया, जबकि वर्ष-1981 में 23 अरब 81 करोड 34 लाख क्यूबिक मीटर पानी बहकर गया। वर्ष-1983 में वर्षाकाल का जल बहाव 39 अरब 24 करोड़ 76 लाख क्यूबिक मीटर रहा। इसके बाद ध्ाीरे-ध्ाीरे नर्मदा का पानी घटने लगा। इस तरह घट रहा नर्मदा जल- (मिलियन क्यूबिक मीटर में)2005-06 2823.58 2006-07 2775.00 2007-08 2045.00 2008-09 1351.00 नोट- आंकड़े केंद्रीय जल आयोग के महेश्वर जल मापक संयंत्र के आंकलन पर औसतन। इनका कहना है-नर्मदा जल का उपयोग बढ़ाने के प्रयासों के साथ प्रदेश में नर्मदा संरक्षण भी काफी काम हो रहा है। नर्मदा जल में कमी बारिश पर भी निर्भर करती है। अभी खतरे वाले हालत नहीं है। फिर भी पौध्ाारोपण सहित पर्यावरण संरक्षण के अनेक प्रयास विभिन्न् स्तरों पर हो रहे हैं। - कन्हैयालाल अग्रवाल, राज्यमंत्री, नर्मदा विकास घाटी, मध्यप्रदेश

Sunday, June 6, 2010

सिमटती नर्मदा, बढ़ता बोझ

- पांच सालों में आध्ाा हुआ नर्मदा में बहाव।
- बढ़ती आबादी से बढ़ रही है निर्भरता।
जितेन्द्र चौरसिया
भोपाल।मध्यप्रदेश की जीवनरेखा नर्मदा सिमटती जा रही है, लेकिन उस पर बोझ बढ़ता जा रहा है। हालत इतने बिगड़ रहे हैं कि पिछले पांच सालों में बारहमासी नर्मदा में पानी आध्ाा हो गया है। पर्यावरण को लीलता 'अव्यवस्थित विकास" नर्मदा के लिए भी साल-दर-साल खतरे का सबब बन रहा है। यही हालत रही तो आने वाले समय में नर्मदा पर संकट गहरा सकता है।
प्रदेश में नर्मदा के पानी को शहरों और गांवों में लाने पर कई योजनाएं बनाई जा रही हैं, लेकिन नर्मदा के संरक्षण के प्रयास नजर नहीं आते। बरसों से बारहमासी नदी मानकर नर्मदा की उपेक्षा का नतीजा है कि पिछले पांच सालों में नर्मदा में पानी करीब आध्ाा हो गया है। केंद्रीय जल आयोग के खरगौन जिले के महेश्वर में नर्मदा जल को मापने के लिए लगाए संयंत्र से प्राप्त डाटा के मुताबिक वर्ष-2005 मंे नर्मदा में औसत 2823.58 मिलियन क्यूबिक मीटर जल बहाव था, जो वर्ष-2008-09 में घटकर महज 1351 मिलियन क्यूबिक मीटर रह गया है। यही फ्लो अभी भी बना हुआ है। वहीं नर्मदा पर निर्भरता की बात करें, तो एक अध्ययन के अनुसार अभी की तुलना में अगले एक दशक में चार गुना आबादी नर्मदा के पानी पर निर्भर हो जाएगी। ऐसे में जल बहाव कम होेने का यही फ्लो रहा, तो आने वाले समय में नर्मदा सूख सकती है। नर्मदा के सिमटते किनारे-नर्मदा किनारे के इलाकों की स्थिति भी ठीक नहीं है। गर्मियों में नर्मदा किनारे देखे जाएं, तो अध्ािकतर नदी, नाले, कुएं व तालाब सूखे हैं। कुओं का जलस्तर भी गिर चुका है। हजारों मूक पशु चारे और पानी के अभाव में दूर-दराज के क्षेत्रों से लाकर भगवान भरोसे नर्मदा किनारे के जंगलों में छोड़ दिए जाते हैं। नर्मदा की सहायक नदियां भी संकट में हैं। करीब एक दर्जन से अध्ािक नदियों की हालत बहुत खराब हैं। इनमें से कुछ सहायक नदियां तो गर्मियों में सूख जाती हंै।
दोहरा संकट-
नर्मदा जल कम होने के अलावा दूसरा कड़वा सच यह है कि जो पानी है, उसका भी उपयोग नहीं हो पा रहा है। नर्मदा जल का वर्ष-2024 में नया निर्ध्ाारण होना है, किंतु अभी तक मध्यप्रदेश ने अपने हिस्से के दस फीसदी पेयजल का भी उपयोग नहीं कर पा रहा है। नर्मदा से मप्र को 18।35 मिलियन एकड़ फीट (एमएएफ) पानी का हिस्सा मिला है, लेकिन अब तक केवल पांच एमएएफ पानी के उपयोग की क्षमता ही विकसित हो सकी है। इससे एक ओर जहां नर्मदा के अस्तित्व पर सवाल उठा हुआ है, वहीं दूसरी ओर मप्र के हिस्से का जल भी छीनने का खतरा है। जब वर्ष-2024 में जल का फैसला होगा, तो उस समय मौजूद जलराशि के आध्ाार पर होगा। इससे खतरा दोगुना है।
क्या है कारण-
नर्मदा जल बहाव में कमी आने का कारण बदलता पर्यावरण है। जंगलों के कटाव के कारण प्रदूषण बढ़ रहा है। इसका असर बारिश पर भी बढ़ रहा है। वहीं औद्योगिकीकरण व अन्य विकास का असर भी हुआ है। ध्ाार्मिक मान्यताओं के कारण भी नर्मदा प्रदूषित हो रही है। प्रदूषण बोर्ड की एक स्टडी के मुताबिक नर्मदा अपने उद्गम स्थल अमरकंटक कुंड पर सबसे अध्ािक मैली है। इसके पीछे भी बदलता पर्यावरण, बढ़ते पर्यटक, खनिज उत्खनन आदि हैं।
जाने कहां गए वो दिन-
नर्मदा में पानी कम होने का अंदाजा इससे लगता है कि वर्ष-1983 में 39 अरब 24 करोड़ 47 लाख क्यूबिक मीटर पानी बहाव था। यह रिकार्ड बहाव है। ओंकारेश्वर के समीप मोरटक्का जल मापक संयंत्र के डाटा के मुताबिक वर्ष-1980 के जून से अक्टूबर के वर्षाकाल में 38 अरब 3 करोड 56 लाख क्यूबिक मीटर पानी नर्मदा में बहकर गया, जबकि वर्ष-1981 में 23 अरब 81 करोड 34 लाख क्यूबिक मीटर पानी बहकर गया। वर्ष-1983 में वर्षाकाल का जल बहाव 39 अरब 24 करोड़ 76 लाख क्यूबिक मीटर रहा। इसके बाद ध्ाीरे-ध्ाीरे नर्मदा का पानी घटने लगा।
इस तरह घट रहा नर्मदा जल- (मिलियन क्यूबिक मीटर में)
2005-06 2823।58
2006-07 2775।00
2007-08 2045।00
2008-09 1351।00
नोट- आंकड़े केंद्रीय जल आयोग के महेश्वर जल मापक संयंत्र के आंकलन पर औसतन।
इनका कहना है-
नर्मदा जल का उपयोग बढ़ाने के प्रयासों के साथ प्रदेश में नर्मदा संरक्षण भी काफी काम हो रहा है। नर्मदा जल में कमी बारिश पर भी निर्भर करती है। अभी खतरे वाले हालत नहीं है। फिर भी पौध्ाारोपण सहित पर्यावरण संरक्षण के अनेक प्रयास विभिन्न् स्तरों पर हो रहे हैं।
- कन्हैयालाल अग्रवाल, राज्यमंत्री, नर्मदा विकास घाटी, मध्यप्रदेश

Thursday, June 3, 2010

कंपनी की बला, ग्राहकों के सिर

मुफ्त बिजली का गोरखध्ांध्ाा-
- सवा बारह लाख कनेक्शनों पर असर
- बिना मीटर के दे रहे हैं अभी बेहिसाब बिजली
- केवल 77 यूनिट का फिक्स बिल बन रहा
- इन कनेक्शनों को निरस्त करने की चेतावनी जारी


जितेन्द्र चौरसिया
भोपाल। एक ओर तो प्रदेश में बिजली की नई दरों ने घरेलू उपभोक्ताओं पर गाज गिरा दी, लेकिन वहीं दूसरी ओर सवा बारह लाख से अध्ािक कनेक्शन ऐसे हैं, जहां पर बिजली कंपनियां मुफ्त की मनचाही बिजली दे रही है। इसमें दोष उपभोक्ताओं का नहीं है, बल्कि बिजली कंपनियों ने ही मीटर नहीं लगाया है। इन उपभोक्ताओं से केवल 77 यूनिट का फिक्स बिल लिया जाता है, लेकिन बिजली की खपत बेहिसाब रहती है। अब इन कनेक्शनों पर बिलिंग की मंजूरी निरस्त करने की चेतावनी कंपनियों को दे दी गई है।
विद्युत अध्ािनियम-2003 के तहत दो सालों में (2005 तक) अनिवार्य रुप से सौ फीसदी मीटराईजेशन होना था, लेकिन तीन साल अध्ािक बीतने के बावजूद लाखों उपभोक्ता मीटर से दूर हैं। मध्यप्रदेश विद्युत नियामक आयोग हर साल बिजली कंपनियों को चेतावनी दे रहा है। बावजूद इसके अभी भी 12 लाख 30 हजार 76 ऐसे घरेलू उपभोक्ता है, जो केवल 77 यूनिट के बिल पर बेहिसाब बिजली का उपभोग कर रहे हैं। नई बिजली दरें घोषित करने के साथ नियामक आयोग ने तीनों बिजली कंपनियों को सख्त चेतावनी दी है कि यदि इसी तरह चलता रहा तो बिना मीटर के कनेक्शनों को अवैध्ा करार दिया जा सकता है। ऐसे हालत में कंपनियों पर भी जुर्माना लगने की नौबत आ सकती है, क्योंकि कंपनियों को विद्युत अध्ािनियम के तहत तीन साल पहले सौ फीसदी मीटरिंग करना अनिवार्य था।
गांवों में हालत खराब-
बिना मीटर के सबसे अध्ािक कनेक्शन गांवों में हैं, जबकि गांवों में कृषि पंपों के कारण ही सबसे अध्ािक खपत होती है। इन कृषि पंपों के सैकड़ों यूनिट की बिजली खपत के एवज में केवल 77 यूनिट का फिक्स बिल लिया जा रहा है। ऐसे करीब बारह लाख दस हजार 521 कनेक्शन हैं। वहीं शहरों में इन कनेक्शनों की संख्या 19 हजार 555 हैं। इसमें राहत वाली बात यह कि पश्चिम क्षेत्र कंपनी में कोई भी शहरी घरेलू बिजली कनेक्शन बिना मीटर का नहीं है।
बिल में कितना अंतर-
77 यूनिट का बिल मौजूदा दरों के आध्ाार पर औसत छह सौ रुपए बनता है। इस तरह केवल छह सौ रुपए में हजारों रुपए की बिजली उपभोक्ता उपयोग करते रहे। खास तौर पर कृषि पंपों पर तो पचास हजार तक की बिजली का भी उपयोग होता है, लेकिन इसके बदले केवल छह सौ रुपए ही चुकाना पड़े हैं।
..तो नहीं बढ़ानी पड़ती दरें-
बिजली दरें बढ़ाने में आयोग और कंपनियों ने जो घाटे को मुख्य वजह बताई है। इस तरह हजारों उपभोक्ताओं को जब बेहिसाब बिजली मुफ्त मंे दी जाएगी, तो भला कैसे कंपनियां घाटे से दूर रह सकती है। लेकिन इन उपभोक्ताओं को मीटर लगाने की बजाए दूसरे ईमानदार उपभोक्ताओं पर दर वृद्धि का बोझ डाल दिया गया। तीन साल पहले इन उपभोक्ताओं के मीटर लग जाने थे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यदि इन उपभोक्ताओं को मीटर लगा दिए जाते, तो करोड़ों रुपए की अतिरिक्त आमदनी होती। इससे संभव था कि बिजली दरों में इतनी बढ़ोत्तरी न करना पड़ती।
क्यों नहीं लगाए मीटर-
बिजली कनेक्शन देने के बावजूद मीटर नहीं लगाने के तीन मुख्य कारण्ा है। पहला यह कि बिजली कंपनियां कैम्प लगाकर जिन अवैध्ा कनेक्शनों को वैध्ा करती है, वह बड़ी संख्या में होते हैं। इन पर मीटर लगाने की गति ध्ाीमी रहती है। इन्हें कनेक्शन देकर फिक्स चार्ज लिया जाने लगता है। दूसरा कारण यह कि कंपनियों के पास मीटर उपलब्ध्ा नहीं होते। इसके चलते वह केवल कनेक्शन दे देती है। तीसरा कारण कृषि पंपों के कनेक्शन हैं। इसमें हजारों कनेक्शन बरसों से बिना मीटर के चल रहे हैं। खुले में मीटर लगने के कारण चोरी हो जाते हैं। इसके चलते कंपनियां गांवों में मीटर ही नहीं लगाती। बावजूद इसके कि इसका नुकसान बिलिंग के समय कंपनी को ही होना है।
- - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - -
प्रदेश में बिना मीटरों के बिजली कनेक्शन-
- - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - -
बिजली कंपनी कुल कनेक्शन बिना मीटर के कुल कनेक्शन बिना मीटर के
- - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - -
पूर्व क्षेत्र 807085 1517 137832 722981
पश्चिम क्षेत्र 927195 -- 1263472 272128
मध्य क्षेत्र 834359 18038 763765 215412
- - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - -
कुल- 2568639 19555 3405269 1210521
- - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - -
(स्त्रोत- मई-2010 का टैरिफ आर्डर)
- - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - -
इनका कहना है-
बिजली कंपनियों को मीटराईजेशन करने के लिए कहा है। यदि कंपनियां ऐसा नहीं करती है, तो अगले टैरिफ पर इसका असर पड़ सकता है। अपेक्षाकृत काम नहीं होता है, तो अगली बार इन विद्युत कनेक्शनों पर बिलिंग की अनुमति निरस्त की जा सकती है।
- प्रशांत चतुर्वेदी, सचिव, राज्य विद्युत नियामक आयोग, मप्र